- इसरो–भुवन और गूगल अर्थ के उपग्रह साक्ष्य बने आधार
- एडवोकेट संदीप चमोली ने की विभाग को शिकायत
- वन विभाग ने बनाई टीम, आज होगी जांच
देहरादून। देहरादून वन प्रभाग के अंतर्गत आर्केडिया बीट, आशारोड़ी रेंज स्थित आरक्षित वन भूमि पर अतिक्रमण और अवैध निर्माण को लेकर एक अत्यंत गंभीर शिकायत सामने आई है। शिकायतकर्ता संदीप मोहन चमोली की ओर से प्रभागीय वन अधिकारी, देहरादून को दिए गए शिकायती पत्र में देश के चर्चित पर्यावरणविद्, पद्म भूषण (2020) एवं पद्मश्री (2006) से सम्मानित डॉ. अनिल प्रकाश जोशी पर आरक्षित वन भूमि पर अवैध कब्जा कर संस्थान संचालन, भवन और सड़क निर्माण जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
शिकायत में आरोप है कि डॉ. जोशी की और से स्थापित संस्था हिमालयी पर्यावरण अध्ययन एवं संरक्षण संगठन (हेस्को) के नाम पर वर्षों से वन कानूनों की अनदेखी करते हुए संरक्षित वन क्षेत्र का निरंतर उपयोग और विस्तार किया गया।
उपग्रह साक्ष्यों से खुली परतें
शिकायत के साथ भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के भुवन पोर्टल तथा गूगल अर्थ के वर्ष 2011, 2013, 2024 और 2025 के तुलनात्मक उपग्रह चित्र संलग्न किए गए हैं। इन चित्रों में स्पष्ट रूप से यह दर्शाया गया है कि किस प्रकार समय के साथ आरक्षित वन क्षेत्र के भीतर हेस्को परिसर, भवन संरचनाएं और सड़कें विकसित होती गईं। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि उपग्रह मानचित्रों में दर्शाया गया निर्माण वास्तव में अधिसूचित वन भूमि के भीतर पाया जाता है, तो मामला केवल प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि गंभीर आपराधिक वन अपराध की श्रेणी में आता है।
क़ानूनी विश्लेषण: किन धाराओं के तहत बनता है मामला?
देहरादून। वन संरक्षण अधिनियम, 1980 की धारा–2 के अनुसार मामला बनता हैं। जिसमें कहा गया है कि, किसी भी आरक्षित या संरक्षित वन भूमि का गैर-वन प्रयोजन हेतु उपयोग, निर्माण, सड़क, भवन या संस्थागत गतिविधि केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति के बिना अवैध है। शिकायत में कहीं भी केंद्र सरकार की अनुमति का उल्लेख नहीं है। .
यदि अनुमति नहीं ली गई, तो यह सीधा उल्लंघन है। वहीं भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 26 और 33 के तहत, आरक्षित वन में अनधिकृत कब्जा, निर्माण, भूमि उपयोग परिवर्तन दंडनीय अपराध है। इसमें जुर्माना, कारावास, अवैध निर्माण ध्वस्तीकरण तक का प्रावधान है। इसके अलावा पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986, यदि पर्यावरणीय स्वीकृति के बिना निर्माण हुआ है, तो, अधिनियम की धारा 15 के अंतर्गत 5 वर्ष तक की सजा या जुर्माना अथवा दोनों संभव हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने टी.एन. गोदावर्मन बनाम भारत संघ सहित अनेक मामलों में स्पष्ट किया है कि: “वन भूमि पर किसी भी प्रकार की गतिविधि, चाहे वह सामाजिक, शैक्षणिक या पर्यावरणीय संस्था द्वारा ही क्यों न की जा रही हो, केंद्र सरकार की अनुमति के बिना अवैध मानी जाएगी।” इस दृष्टि से देखें तो संस्था का उद्देश्य कानून के उल्लंघन का बचाव नहीं बन सकता।
अंकिता भंडारी प्रकरण से भी जुड़ा रहा नाम
देहरादून। डॉ. अनिल प्रकाश जोशी हाल ही में अंकिता भंडारी हत्याकांड से जुड़े एक अन्य प्रकरण में भी चर्चा में आए थे, जब उनकी शिकायत पर सीबीआई जांच होने की बात सामने आई थी।
आशारोड़ी रेंज के अंतर्गत आरक्षित वन भूमि पर अतिक्रमण एवं अवैध निर्माण की शिकायत प्राप्त हुई है। मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए राजस्व विभाग के साथ संयुक्त स्थलीय सर्वेक्षण का निर्णय लिया गया है। 21 जनवरी 2026 को निर्धारित समय पर संबंधित अधिकारियों की मौजूदगी में स्थल निरीक्षण किया जाएगा। यदि वन भूमि पर किसी भी प्रकार का अवैध कब्जा या निर्माण पाया जाता है, तो वन अधिनियम के तहत सख्त विधिक कार्रवाई की जाएगी। वन भूमि का संरक्षण विभाग की सर्वोच्च प्राथमिकता है…
— नीरज कुमार, प्रभागीय वनाधिकारी, देहरादून वन प्रभाग।


