देश की आज़ादी की जंग और धर्मनिरपेक्ष संविधान के निर्माण में जमीयत उलमा-ए-हिंद की नेतृत्वकारी भूमिका रही है

role of Jamiat Ulema-e-Hind freedom struggle

(बात चीत पर आधारित मौलाना अरशद मदनी, अध्यक्ष जमीयत उलेमा-ए-हिंद)

बात कुछ अजीब-सी लग सकती है, लेकिन यह एक कड़वी सच्चाई है कि आज़ादी के बाद कांग्रेस ने अपने शासनकाल में धर्म के आधार पर नफ़रत की राजनीति के प्रति जो नरम और लचीली नीति अपनाई, उसने देश और संविधान—दोनों को गहरा नुकसान पहुँचाया। आज़ादी के 76 वर्ष बाद जिस तरह खुलेआम संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों को कुचला जा रहा है, उसकी कल्पना हमारे स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने वाले पूर्वजों ने भी नहीं की होगी। जिन सिद्धांतों और आदर्शों पर स्वतंत्र भारत के संविधान की नींव रखी गई थी, यदि उन्हीं सिद्धांतों के अनुरूप पूरी ईमानदारी से संविधान को लागू किया गया होता, तो आज हमें यह दिन नहीं देखने पड़ते। 

यह बात हम यूँ ही नहीं कह रहे हैं, बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से यह एक दुखद सच्चाई है। कांग्रेस नेतृत्व ने न जाने किस भय के कारण शुरुआत से ही धर्म के नाम पर नफ़रत की राजनीति का खुलकर और सख़्ती से विरोध करने के बजाय एक लचीली नीति अपनाई। सांप्रदायिक ताक़तों के साथ नरमी बरती गई और संविधान व क़ानून के अनुसार उनके विरुद्ध कड़ी कानूनी कार्रवाई से परहेज़ किया गया। इसी का परिणाम यह हुआ कि सांप्रदायिक शक्तियों को फलने-फूलने का भरपूर अवसर मिल गया। महात्मा गांधी की हत्या के पीछे सांप्रदायिक ताक़तों का हाथ था। यदि उसी समय सांप्रदायिकता के सिर को कुचल दिया गया होता, तो देश को भारी विनाश से बचाया जा सकता था। देश के विभाजन के बाद जब पूरे भारत में मुसलमानों के विरुद्ध हिंसक दंगे भड़क उठे, तो उन्हें रोकने के लिए महात्मा गांधी ने उपवास रखा।

 यह बात सांप्रदायिक शक्तियों को ही नहीं, बल्कि कांग्रेस में मौजूद कुछ बड़े नेताओं को भी अच्छी नहीं लगी और वे गांधी जी के विरोध में खड़े हो गए। अंततः उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया। हमारी दृष्टि में महात्मा गांधी जैसी महान हस्ती की हत्या दरअसल भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र की हत्या थी। लेकिन अफ़सोस कि उस समय कांग्रेस नेतृत्व को जो कदम उठाने चाहिए थे, उसने वे नहीं उठाए। जमीयत उलमा-ए-हिंद का नेतृत्व लगातार कांग्रेस से यह माँग करता रहा कि सांप्रदायिकता के इस उन्माद को रोका जाए, लेकिन इस माँग पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया, जिससे सांप्रदायिक ताक़तों को और बढ़ावा मिला। 

आज की पीढ़ी इस ऐतिहासिक सच्चाई से भी अनजान है कि आज़ादी से पहले ही जमीयत उलमा-ए-हिंद के बुज़ुर्गों ने कांग्रेस नेताओं से लिखित वादा ले लिया था कि स्वतंत्रता के बाद देश का संविधान धर्मनिरपेक्ष होगा और उसमें सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों को पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त होगी। 

लेकिन आज़ादी के बाद जब देश का विभाजन हुआ, तो कांग्रेस नेताओं का एक बड़ा वर्ग यह कहने लगा कि अब जबकि मुसलमानों के लिए धर्म के नाम पर एक अलग देश बन चुका है, इसलिए भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष नहीं होना चाहिए। 

ऐसे नाज़ुक समय में जमीयत उलमा-ए-हिंद के नेताओं ने कांग्रेस नेताओं का हाथ पकड़कर उनसे कहा कि यदि देश का विभाजन हुआ है, तो उसके दस्तावेज़ पर हमने नहीं, आपने हस्ताक्षर किए हैं, इसलिए आप अपना वादा पूरा करें। परिणामस्वरूप एक धर्मनिरपेक्ष संविधान तो तैयार हो गया, लेकिन सांप्रदायिकता की जड़ें भीतर-ही-भीतर और गहरी होती चली गईं। 

जमीयत उलमा-ए-हिंद के निरंतर दबाव के बावजूद इस पर प्रभावी अंकुश नहीं लगाया गया, जबकि उस समय केंद्र और सभी प्रांतों में कांग्रेस की ही सरकारें थीं। यदि वह चाहतीं, तो सांप्रदायिक ताक़तों के विरुद्ध कठोर क़ानून बना सकती थीं, लेकिन जो नरम नीति अपनाई गई, उसी का नतीजा यह हुआ कि सांप्रदायिक शक्तियाँ और अधिक मज़बूत होती चली गईं। 

देश की आज़ादी के लिए कुर्बानी देने वाले हमारे बुज़ुर्गों ने जिस भारत का सपना देखा था, वह यह हरगिज़ नहीं,हमारे बुज़ुर्गों ने एक ऐसे भारत का सपना देखा था, जहाँ रहने वाले सभी लोग हमेशा की तरह जाति, बिरादरी और धर्म से ऊपर उठकर आपस में प्रेम, शांति और भाईचारे के साथ रह सकें। सिर्फ़ आज़ादी ही नहीं, बल्कि भारत का कोई भी इतिहास उलेमा-ए-किराम (मुस्लिम विद्वान) के उल्लेख के बिना अधूरा है। भारत की आज़ादी की लड़ाई की शुरुआत उलेमा और मुसलमानों ने की थी। उन्होंने उस समय देश के लोगों को गुलामी का एहसास दिलाया, जब इसके बारे में कोई सोच भी नहीं रहा था। भारत में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ सबसे पहले विद्रोह का बिगुल देश के सबसे बड़े आलिम शाह अब्दुल अज़ीज़ देहलवी रह. ने अपने ही मदरसे से फूँका था। 

हमारे अकाबिर और उलेमा ने उस समय आज़ादी की चिंगारी सुलगा दी थी, जब दूसरी क़ौमें गहरी नींद में सोई हुई थीं। हम देश की असली तारीख़ से जानबूझकर आँखें मूँद लेने वालों को यह भी बताना चाहते हैं कि ज़ालिम अंग्रेज़ हुक्मरानों के ख़िलाफ़ बग़ावत करने वाले हमारे यही बुज़ुर्ग थे, जिन्होंने काबुल में एक निर्वासित भारतीय सरकार क़ायम की थी। इस सरकार का अध्यक्ष एक हिंदू राजा महेंद्र प्रताप सिंह को बनाया गया था, क्योंकि हमारे अकाबिर मज़हब से ऊपर उठकर केवल एकता और इंसानियत के आधार पर इस देश को गुलामी की ज़ंजीरों से आज़ाद कराना चाहते थे। वे इस सच्चाई से भली-भाँति वाक़िफ़ थे कि हिंदुओं, सिखों और मुसलमानों को एक साथ लाए बिना यह सपना पूरा नहीं हो सकता।

 इसी कारण जब शेख़-उल-हिंद माल्टा की जेल से रिहा होकर बाहर आए, तो उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि देश की आज़ादी का मिशन केवल मुसलमानों की कोशिशों से पूरा नहीं हो सकता, बल्कि अगर अंग्रेज़ों के चंगुल से देश को बाहर निकालना है, तो आज़ादी की लड़ाई को हिंदू-मुस्लिम एकता के साथ आंदोलन चलाना होगा। उन्होंने यह भी फ़रमाया था कि अगर सौभाग्य से सिखों की बहादुर और जुझारू क़ौम भी इस आंदोलन में शामिल हो जाए, तो आज़ादी की राह और भी आसान हो जाएगी। 

शेख़-उल-हिंद का यह कथन आज भी किताबों में सुरक्षित है। हमारे बुज़ुर्ग हिंदू-मुस्लिम एकता के इसी रास्ते पर आगे बढ़े और अंततः देश को अंग्रेज़ों की गुलामी से आज़ाद कराया। दुर्भाग्य यह रहा कि देश आज़ाद तो हुआ, लेकिन उसका विभाजन भी हो गया, और यह विभाजन विनाश और तबाही का कारण बन गया। यह तबाही किसी एक विशेष समुदाय तक सीमित नहीं रही, बल्कि हिंदुओं और मुसलमानों ओर सभी के लिए विनाश का कारण बनी। यदि विभाजन न हुआ होता और ये तीनों देश एक रहते, तो आज यह स्थिति हरगिज़ पैदा न होती। 

यदि यह शक्ति एक होती, तो दुनिया की कोई भी ताक़त हमारी ओर आँख उठाकर देखने का साहस नहीं कर सकती थी। इस लंबी स्वतंत्रता की लड़ाई की यात्रा के बाद धर्मनिरपेक्ष संविधान के निर्माण में देश की सक्रिय और संघर्षशील संस्था जमीयत उलमा-ए-हिंद ने जो नेतृत्वकारी भूमिका निभाई, वह हर दृष्टि से ऐतिहासिक है। यही कारण था कि जैसे-जैसे देश की आज़ादी की संभावनाएँ प्रबल होती गईं, हमारे उलेमा उस समय के शीर्ष नेतृत्व जैसे मोतीलाल नेहरू, महात्मा गांधी जी और जवाहरलाल नेहरू आदि से निरंतर यह लिखित व मौखिक आश्वासन लेते रहे कि आज़ादी के बाद देश का संविधान एक धर्मनिरपेक्ष संविधान होगा।

 कांग्रेस नेतृत्व भी बार-बार यह भरोसा दिलाता रहा कि मुसलमानों की मस्जिदें, मदरसे, इमामबाड़े, कब्रिस्तान, उनकी भाषा, उनकी संस्कृति और उनकी तहज़ीब ये सभी पूरी तरह सुरक्षित रहेंगी। लेकिन यह एक अजीब संयोग है कि देश आज़ाद हुआ और हमारे अकाबिर के विचारों के विपरीत उसका विभाजन भी हो गया या यूँ कहें कि विभाजन कर दिया गया। यदि उस समय हमारे बुज़ुर्ग दूरदर्शिता से काम न लेते और ज़रा-सी भी कमज़ोरी दिखा देते, तो आज यह देश एक लोकतांत्रिक राष्ट्र न होकर एक हिंदू राज्य बन चुका होता और तब शायद मुसलमानों सहित देश की असंख्य धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक आबादियाँ अपने धार्मिक अधिकारों से वंचित होतीं। लेकिन अफ़सोस कि मौजूदा सरकार वक़्फ़ संशोधन विधेयक लाकर उन मस्जिदों, दरगाहों, कब्रिस्तानों, इमामबाड़ों और वक़्फ़ की संपत्तियों को हड़पना चाहती है, जिनकी सुरक्षा का वादा आज़ादी के समय भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान में किया गया था। 

आज जो लोग हमारी देशभक्ति पर सवाल उठाते हैं, वे यह बताएं कि उनके लोगों ने देश की आज़ादी के लिए क्या किया? उन्होंने कौन-सी कुर्बानियाँ दीं? पहले हमने देश को आज़ाद कराने के लिए बलिदान दिए, लेकिन अब ऐसा प्रतीत होता है कि हमें इस आज़ादी की हिफ़ाज़त के लिए भी कुर्बानियाँ देनी होंगी। यदि हमने ऐसा नहीं किया, तो वह दिन दूर नहीं जब सच बोलना और आवाज़ उठाना भी एक गंभीर अपराध घोषित कर दिया जाएगा। जमीयत उलमा-ए-हिंद का अतीत और वर्तमान इस बात के गवाह हैं कि उसने हमेशा देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता को बनाए रखने के लिए सकारात्मक प्रयास किए हैं और देश के विभाजन का विरोध किया है। हमारे गलों में जूतों के हार डाले गए, हमारे ऊपर कुफ़्र के फ़तवे लगाए गए, लेकिन जमीयत उलमा-ए-हिंद अपने सिद्धांत से रत्ती भर भी पीछे नहीं हटी। हमें देश के संविधान से इसलिए प्रेम है क्योंकि यह देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता का वह दस्तावेज़ है, जिसकी रोशनी में हम देश के भविष्य को संवार सकते हैं और इसे एक खुशहाल तथा पूरी दुनिया के लिए एक आदर्श राष्ट्र बना सकते हैं।

 हमारी नज़र में संविधान लोकतंत्र की बुनियाद का वह पत्थर है कि यदि उसे उसकी जगह से हिला दिया गया, तो लोकतंत्र की यह महान इमारत भी खड़ी नहीं रह सकेगी। इसी लिए हम बार-बार कहते हैं कि संविधान बचेगा तो देश बचेगा। पिछले कुछ वर्षों के दौरान देश में जिस एकतरफ़ा राजनीति को बढ़ावा दिया जा रहा है, उसने संविधान के अस्तित्व पर सवालिया निशान लगा दिया है। ऊपर-ऊपर संविधान की क़सम खाई जाती है, उसके कसीदे पढ़े जाते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि संवैधानिक आदेशों का खुला उल्लंघन करते हुए देश की अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुसलमानों को नए-नए हथकंडों से परेशान किया जा रहा है। ऐसे समय में केवल हमारी ही नहीं, बल्कि देश के उन सभी नागरिकों की यह बुनियादी ज़िम्मेदारी है जो संविधान और लोकतंत्र में विश्वास रखते हैं, कि वे संविधान की रक्षा के लिए आगे आएँ, क्योंकि यदि संविधान की सर्वोच्चता समाप्त हो गई तो लोकतंत्र भी जीवित नहीं रह सकेगा। 

आप गहराई से महसूस करेंगे कि धार्मिक नफ़रत और उग्रता को हर स्तर पर बढ़ावा दिया जा रहा है। एकता और भाईचारे को समाप्त करने के लिए दिलों में नफ़रत के बीज बोए जा रहे हैं। एक विशेष समुदाय को निशाना बनाने के उद्देश्य से आए दिन नए-नए क़ानून बनाए जा रहे हैं। न्याय का गला घोंटा जा रहा है और संविधान की सर्वोच्चता को समाप्त कर, न्याय और क़ानून के शासन के स्थान पर तानाशाही रवैया अपनाकर लोगों में भय और आतंक फैलाया जा रहा है। आज जिस आज़ादी और लोकतंत्र का पूरी दुनिया में ढोल पीटा जा रहा है, वह हमारे बुज़ुर्गों और पूर्वजों की लंबी संघर्षपूर्ण यात्रा और बलिदानों का परिणाम है।

 जमीयत उलमा-ए-हिंद का मूल उद्देश्य देश में लोकतंत्र की मजबूती और संविधान की रक्षा सुनिश्चित करना है, साथ ही शांति, सौहार्द और आपसी भाईचारे की सदियों पुरानी परंपरा को नई ज़िंदगी देना है। किसी भी सभ्य और विकसित समाज के लिए न्याय और शांति सबसे बड़ा मापदंड होते हैं। हर शासक का मूल कर्तव्य अपनी प्रजा यानी जनता को न्याय प्रदान करना होता है, लेकिन अफ़सोस कि इसके विपरीत सांप्रदायिक सोच रखने वाले लोग एक विशेष समुदाय को दीवार से लगाने की सोची-समझी साज़िश कर रहे हैं।

 युवाओं को रचनात्मक कार्यों में लगाने के बजाय उन्हें विनाश और नफ़रत का औज़ार बनाया जा रहा है। पक्षपाती मीडिया झूठ और उकसावे को फैलाने का सबसे बड़ा माध्यम बन गया है। यह कितनी विडंबनापूर्ण स्थिति है कि एक ओर संविधान की क़सम खाई जाती है और दूसरी ओर संविधान के मार्गदर्शक सिद्धांतों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। 

एक विशेष समुदाय के साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा है मानो उसके पास अब कोई संवैधानिक अधिकार ही नहीं रह गया हो। देश की अल्पसंख्यकों को संतुष्ट करना किसी भी शासक की ज़िम्मेदारी होती है, लेकिन हो यह रहा है कि देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर लगातार हमले हो रहे हैं।

 मदरसों पर पाबंदियाँ लगाई जा रही हैं, मस्जिदों को शहीद किया जा रहा है, धार्मिक स्वतंत्रता छीनी जा रही है, खाने-पीने तक पर रोक लगाई जा रही है, यहाँ तक कि हमसे हमारे जीने का अधिकार भी छीना जा रहा है। यह सब उस समय हो रहा है जब वही धर्मनिरपेक्ष संविधान आज भी अपनी मूल शक्ल में मौजूद है, जिसमें देश की अल्पसंख्यकों को न केवल विशेष अधिकार दिए गए हैं, बल्कि पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी भी दी गई है। यही वह धर्मनिरपेक्ष संविधान है जिसके लिए हमारे पूर्वजों ने डेढ़ सौ वर्षों तक देश को ग़ुलामी से आज़ाद कराने के लिए कुर्बानियाँ दीं। 

दुखद बात यह है कि स्वयं को धर्मनिरपेक्ष कहने वाली कुछ राजनीतिक पार्टियाँ केवल सत्ता के लाभ के लिए सांप्रदायिक ताक़तों की परोक्ष सहायता और समर्थन कर रही हैं, जो किसी भी हाल में एक मज़बूत लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। 

नफ़रत की राजनीति अपने चरम पर पहुँच चुकी है, हर स्तर पर नफ़रत को सींचा जा रहा है। जो लोग ऐसा कर रहे हैं, उनसे हम साफ़ शब्दों में कहना चाहते हैं कि नफ़रत की राजनीति देश के प्रति वफ़ादारी नहीं, बल्कि देश की शांति, एकता और अखंडता के साथ ग़द्दारी है। जो लोग धर्म के नाम पर नफ़रत फैलाते हैं, वे कभी भी धर्म के सच्चे प्रतिनिधि नहीं हो सकते, क्योंकि दुनिया का हर धर्म शांति, प्रेम और आपसी सम्मान का संदेश देता है। इसलिए देश के हर नागरिक हिंदू, मुसलमान और अन्य सभी की यह ज़िम्मेदारी है कि वे सांप्रदायिकता के मुक़ाबले शांति, एकता और भाईचारे को बढ़ावा दें और नफ़रत की राजनीति के ख़िलाफ़ खुलकर सामने आएँ।

क्योंकि हालात जिस क़दर विस्फोटक हो चुके हैं, उन्हें देखते हुए अगर अब भी ख़ामोशी अपनाई गई, तो नफ़रत की यह राजनीति देश की शांति और एकता के लिए एक गंभीर ख़तरा बन सकती है।